देवशयनी एकादशी व्रत

आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस वर्ष देवशनी एकादशी 15 जुलाई 2016 के दिन मनाई जानी है. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ भी माना गया है. देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी पद्मनाभा तथा प्रबोधनी के नाम से भी जाना जाता है सभी उपवासों में देवशयनी एकादशी व्रत श्रेष्ठतम कहा गया है. इस व्रत को करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, तथा सभी पापों का नाश होता है. इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना करने का महतव होता है क्योंकि इसी रात्रि से भगवान का शयन काल आरंभ हो जाता है जिसे चातुर्मास या चौमासा का प्रारंभ भी कहते हैं.चूँकि इस समय भगवन श्री हरी शयन कर रहे होते है तो इस समय कोई भी शुभ कार्य वर्जित होता है .इन चार महीनो में कोई भी तपस्वी भ्रमण नहीं करता बल्कि एक जगह बेथ कर तपस्या करता है यह भी मान्यता है की इस समय सरे तीर्थ ब्रज की धरती पर आ जाते है .यही वजह है की श्रध्दा से लोग ब्रज की धरती पर जा कर भगवन की वंदना करते है .

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

 प्रबोधनी एकादशी से संबन्धित एक पौराणिक कथा प्रचलित है. सूर्यवंशी मान्धाता नम का एक राजा था. वह सत्यवादी, महान, प्रतापी और चक्रवती था. वह अपनी प्रजा का पुत्र समान ध्यान रखता है. उसके राज्य में कभी भी अकाल नहीं पडता था. परंतु एक समय राजा के राज्य में अकाल पड गया अत्यन्त दु:खी प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी यह देख दु;खी होते हुए राजा इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन ढूंढने के उद्देश्य से सैनिकों के साथ जंगल की ओर चल दिए  घूमते-घूमते वे ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंच गयें. राजा ने उनके सम्मुख प्रणाम उन्हें अपनी समस्या बताते हैं. इस पर ऋषि उन्हें एकादशी व्रत करने को कहते हैं. ऋषि के कथन अनुसार राज एकादशी व्रत का पालन करते हैं ओर उन्हें अपने संकट से मुक्ति प्राप्त होती है.

इस व्रत को करने से समस्त रखते वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

वैज्ञानिक महत्व

देवशयनी एकादशी से सारे शुभकर्मो पर विराम लगना और संयम –नियम अपनाना विज्ञानं सम्मत भी है बारिश के मौसम के साथ ही मनुष्य की पाचन क्रिया शिथिल हो जाती है और इसलिए  चातुर्मास में उसे एक ही समय भोजन का व्रत लेने को कहा गया है .इसके अतिरिक्त चूँकि वर्षकाल में सूर्य की उर्जा भी मद्धिम हो जाती है तो किसी भी नए काम को त्याज्य मन जाता है जब वर्षा ऋतू बित जाती है तो देव प्रबोधिनी एकादशी से शुभ पर लगा विराम भी हट जाता है .

चातुर्मास के चार मास

  • आयुर्वेद में चातुर्यमास के चार महीने के दौरान पत्तेदार साक –सब्जी खाना वर्जित बताया गया है चूँकि इन महीनो में पाचन तंत्र शिथिल हो जाता है तो इसे में एक समय का व्रत ही शारीर को निरोगी रखने में मदद करता है शारीर पर भर कम पड़ता है .
  • इन चार महीनो में अपनी रूचि और पसंद की चीजों को छोड़ने का संकल्प होना चाहीये .यह संकल्प इसलिए महत्वपूर्ण है क्योकि व्यक्ति अपनी इच्छाओ को नियंत्रण में रखना सीखता है .
  • इस अवधि में व्रती में नरम और आरामदायक बिस्तर का भी त्याग कर देना चाहिए क्योकि शारीर को जितना सहजता से दूर रखा जाये व्यक्ति उतना ही मोह माया से दूर रहता है .
  • इन चार महीनो के दौरान जलाशय में स्नान से पुण्य की प्राप्ति होती है चूँकि भगवन विष्णु चार महीनो के लिए पटल निवास करते है इसलिए उनकी कृपा प्राप्ति के लिए नदी या सरोवर में स्नान की महत्ता है .

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